अयोग्य गुरु को त्यागने की नहीं है मनाही

-दी राईटर

ज्ञान के लाभार्थी गुरु के प्रति श्रद्धावनत रहते हैं। संत कबीर ने कहा है-‘कबीर पूरे गुरु बिना, पूरा शिष्य न होय। गुरु लोभी शिष लालची, दूनी दामन होय।।
संतों का, गुणी जनों का, गुरु के सानिघ्य से ज्ञान प्राप्ति के लाभार्थियों का मानना है कि ‘जब कभी पूरे और सच्चे सद्गुरु मिलेंगे, तभी उनके सहारे अपना परम कल्याण बनाने का काम समाप्त होगा।’ परम कल्याण बनाने का काम समाप्त होगा।’ वस्तुतः बिना गुरु भक्ति के विशिष्य योग किया ‘सूरत शब्द योग’ द्वारा परम प्रभु सर्वेश्वर की भक्ति में पूर्ण होकर अपना परम कल्याण बना लेना असम्भव है। वैसे आधिभौतिक जीवन में भी ऐसे योग्य शिक्षक जो आधिभौतिक ज्ञान प्रदान करते हैं वह भी गुरु ही माने जाते हैं।

लेकिन आगे बढ़कर गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि मानव जीवन में जो अध्यात्म का बीज बोकर ‘आत्मज्ञान’ प्राप्त करने का योग-मार्ग बताता है वही सच्चा गुरु है। उसे सद्गुरु भी कहते हैं। ऐसे गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए परम संतों ने कहा है कि पूरे और सच्चे सद्गुरु का मिलना ईश्वर के मिलने के तुल्य ही है। तब ऐसे गुरु होते कैसे हैं और उनको कैसे परिभाषित किया जाये? उन्हें पहचाना कैसे जाये? गुरु के रूप में उनके गुरु-तत्व को परखा कैसे जाये? तो, संतों ने ही जिन्होंने गुरु के गुणों की पहचान की है, बताया है कि ‘जीवन काल में जिनकी सूरत सारे आवरणों को पार कर शब्दातीत पद में समाधि समय लीन होती है और पिण्ड में बरतने के समय उन्मुनी में रहकर सार शब्द में लगी रहती है, ऐसे जीवन मुक्त परम संत पुरूष पूरे और सच्चे सद्गुरु कहे जाते हैं।


सांसारिक जीवन में समस्त प्राणी साधारणतः एक ही तरह का जीवन जीते हैं। जन्म लेने के बाद उदर पूर्ति के साथ जीवन यात्रा शुरू होती है, जो मरण के क्षण तक संसार में व्यतीत होती है। इस बीच विविध सांसारिक कर्मों में आसक्त होकर प्राणी दिन काटता रहता है। हालांकि मनुष्य तनधारी जीवन उन्नत प्राणी माना जाता है। लेकिन बिरले ही अपने असली काम ‘मोक्ष प्राप्ति’ की दिशा में उन्मुख हो पाते हैं। अन्यथा दिन रात सांसारिकता में व्यस्त रहकर अंत में जीवन गवांकर पता नहीं कहां चले जाते हैं। लेकिन सच्चे सद्गुरु वही होते हैं जो जीवन के असली उद्देश्य के प्रति समझदारी उत्पन्न कर संतुलन का भी ज्ञान दे और साधना का मार्ग प्रशस्त करे।


लगभग सभी धर्मों में यही सत्य वर्णित है कि परम् प्रभु सर्वेश्वर को पाने की विद्या के अतिरिक्त जितनी विधाएं हैं, उन सबसे उतना लाभ नहीं, जितना कि परम प्रभु के मिलने से लाभ है। परम प्रभु से मिलने की शिक्षा की थोड़ी सी बात के तुल्य लाभदायक दूसरी-दूसरी शिक्षाओं की अनेकानेक बातें नहीं हो सकती हैं। इसलिए इस विद्या को सिखलाने वाले गुरु से बढ़कर उपकारी दूसरे कोई गुरु नहीं हो सकते और इसीलिए किसी दूसरे गुरु का दर्जा, इनके दर्जे के तुल्य नहीं हो सकता है। केवल आधिभौतिक विद्या के प्रकांड से भी प्रकांड या अत्यंत धुरंधर विद्वान के अन्तर के आवरण टूट गये हों, यह आवश्यक बात नहीं है। ऐसे आधिभौतिक विद्वानों के पास कोई ऐसा यंत्र भी नहीं होता कि जिससे अन्तर का आवरण टूटे या कटे। परन्तु सच्चे और पूरे आध्यात्मिक सद्गुरु में ये बातें, यह ज्ञान आवश्यक हैं। सच्चे और पूरे सद्गुरु का किंचित मात्र भी संकेत संसार की सब विद्याओं से विशेष लाभदायक है।


यहां एक बात गौर करने की है कि पूरे और सच्चे सद्गुरु की पहचान अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी जो शुद्धाचरण रखते हैं, जो नित्य और नियमित रूप से नादानुसंधा का अभ्यास करते हैं और जो सन्तों के मत को समझा सकते हैं तो ऐसे लोगों में श्रद्धा रखनी और उनको गुरु रूप में धारण करना अनुचित नहीं माना जायेगा। किसी व्यक्ति में दूसरे-दूसरे गुण कितने भी अधिक हों, परन्तु यदि आचरण में शुद्धता नहीं पायी जाए तो वह गुरु मानने योग्य नहीं है। यदि ऐसे को गुरु माना भी हो, तो उसका दुराचरण जान लेने पर उससे अलग रहना ही अच्छा है। उसकी जानकारी अच्छी होने पर भी आचरणहीनता के कारण उसका संग करना योग्य नहीं है और गुणों की अपेक्षा गुरु के आचरण का प्रभाव शिष्यों पर अधिक पड़ता है। आध्यात्मिक व्यक्तियों का स्पष्ट कहना है कि गुरु में शुद्धाचरण का रहना ही उसकी गुरूता तथा गुरूता है, नहीं तो वह गरु अर्थात् गाय-बैल है। कबीर कहते हैं-

गुरु से ज्ञान जो लीजिए, शीश दीजिए दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, राखि जीवन अभिमान।।
तन मन ताको दीजिए, जाके विषय जाहि।
आपा सबही डारिके, राखै साहब माहिं।।
झूठे गुरु को पच्छ को, तजत न कीजै बार।
द्वार न पावै शब्द का, भटकै बारम्बार।।

इसलिए संसार सागर के मर्म को समझकर इसे पार करने के लिए सच्चे सद्गुरु की जरूरत है। झूठे सद्गुरु को त्यागने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए।
इसीलिए तो कहा गया है कि पूरे और सच्चे सद्गुरु को धारण करने का फल तो अपार है ही, परन्तु ऐसे गुरु का मिलना अति दुर्लभ है। ज्ञानवान, शुद्धाचारी तथा सुरत शब्द के अभ्यासी पुरूष को गुरु धारण करने से शिष्य उस गुरु के संग से धीरे-धीरे गुरु के गुणों का लाभ प्राप्त करे, यह सम्भव है, क्योंकि संग से रंग लगता है और शिष्य के लिए वैसे गुरु की शुभकामना भी शिष्य को कुछ न कुछ लाभ अवश्य पहुंचायगी। ऐसा इसलिए कि एक का मनोबल दूसरे पर प्रभाव डाले, यह भी सम्भव है। लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि जो केवल सुरत शब्द योग का अभ्यास करे किन्तु ज्ञान और शुद्धाचरण की परवाह नहीं करे तो ऐसे को गुरु के रूप में धारण करना किसी तरह भला नहीं है।

यदि कोई इस तरह की सावधानी नहीं बरते और परवाह भी नहीं कर किसी दुराचारी जानकार को ही गुरु धारण कर ले तो सच्चे गुरु से प्राप्त होने वाले लाभों से वह वंचित रहेगा और केवल अपने से अपनी संभाल करना उसके लिए अत्यंत भीषण काम होगा। लेकिन अनेक संतों और विद्वान श्रद्धालुओं ने ऐसे अध्यात्म शक्ति सम्पन्न तेज पुरूषों के सानिध्य से प्राप्त अनुभूति पूर्ण आध्यात्मिकता का वर्णन किया है जो सद्गुरु के प्रताप को उजाकर करता है। पूरे गुरु के पवित्र तेज से, उनके उत्तम ज्ञान से तथा उनके ध्यान बल से शिष्यों को लाभ होता है।
बाबा देवी साहब द्वारा प्रकाशित ‘घट-रामायण में कहा गया है-

मुर्शिद कर्मिल से मिल सिद्क और सबूरी से तकी
जो तुझे देगा फहम शहरग के पाने के लिए।।
अर्थात्-‘ऐ तकी सचाई और संतोष धारण कर पूरे गुरु से जाकर मिलो जो तुझको शहरग (सुषुम्ना नाड़ी) पाने की समझ देगा।’

एक दूसरा पद है-

तुलसी बिना करम किसी मुर्शिद रसीदा के।
राहे नाजात दूर है उस पार देखना।।

अर्थात् ‘तुलसी साहब कहते हैं कि किसी पहुंचे हुए गुरु के दया-दान के बिना मुक्ति रास्ता और जीवन के उस पार देखना दूर है।’
वराहोपनिषद् में भी कहा गया है कि ‘सद्गुरुकी कृपा के बिना विषय का त्याग दुर्लभ है। तत्व दर्शन दुर्लभ है और सहजावस्था दुर्लभ है। इसके लिए गुरु का दया दान ही श्रेश्ठ अवलंबन है। इसी के लिए गुरु सेवा की उपयोगिता है। भगवान बुद्ध ने भी आज्ञा दी है कि ‘मनुष्य जिससे बुद्ध का बताया हुआ धर्म सीखे तो उसे उनकी परिश्रम से सेवा करनी चाहिए जैसे ब्राह्मण अग्नि की पूजा करता है (धम्मपद, 26वां वचन, संख्या 292)।’

‘मेरा यह उपदेश हिये में धारियो।
गुरु चरनन मन राखि, सेव तन गारियो।।
जो गुरु झिड़कै लाख तो मुख नहिं मोड़ियो।
गुरु से नेह लगाय सबने सो तोड़ियो।।’

वैसे भी गुरु की कृपा सब पर एक समान बरसती है जैसे वर्षा का हल। यह पात्र पर निर्भर करता है वह कृपा जल कितना संग्रह कर पाता है। संत और गुरु समदर्शी होते हैं। उनके पास किसी के लिए विभेद नहीं होता है। इसीलिए सुपात्र बनकर गुरु का कृपा जल बटोर सकते हैं। किसी से कोई विद्या सीखने को सिखाने वाले से नम्रता से रहने का तथा उनकी प्रेम सहित कुछ सेवा करने का ख्याल हृदय में स्वाभाविक ही उदय होता है, इसलिए गुरु भक्ति स्वाभाविक है। गुरु भक्ति के विरूद्ध बोलने के लिए साधु-संतों ने मना किया है। इसे फजूल बताया है। हालांकि अयोग्य गुरु को त्यागने की बात को अप्रांसांगिक नहीं माना गया है।
गुरु की महानता के कारण ही प्रतिवर्ष आसाढ़पूर्णिमा को भगवान वेद व्यास के जन्म दिवस को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। भारत ही नहीं अब तो विश्व स्तर पर इस पावन दिवस पर गुरु सेवा की प्रेरणा जागृत होती है।