मुकेश अंबानी ने पूछा था लंबा जीवन जीने का उपाय

-धर्मराज राय

देश की सवा सौ करोड़ की आबादी में ‘रीयल हीरोज’ अर्थात वास्तविक नायकों की सूची में चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में अपने समर्पण और उदारता के कारण राॅंची के वयोवृद्ध चिकित्सक डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ऊपर है। उन्हें लोकप्रियता के मापदंड पर ही नहीं बल्कि चिकित्सकीय पेशे के सदुपयोग में सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी की कसौटी पर भी खरा पाया गया है।

‘मुखर्जी डाक्टर’ के नाम से रोगियों के बीच चर्चित डाक्टर एस. पी. मुखर्जी विगत 52 वर्षों से राॅंची के लालपुर चैक स्थित अपने निजी आवास पर प्रतिदिन संध्या सात बजे से मात्र पाॅंच रूपए सांकेतिक चिकित्सा शुल्क लेकर इलाज करते हैं। उसी भवन में उनका पैथोलाॅजी क्लीनिक भी चलता है।
डाक्टर मुखर्जी ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि शहर के चिकित्सक उनसे नाराज रहते हैं। पाॅंच रूपये शुल्क लेकर इलाज करने वाले डाक्टर मुखर्जी ऐसे लोगों की परवाह किये बिना 80 वर्ष से ऊपर की उम्र में भी डटे हुए हैं। विगत दस वर्षों से बीमार पत्नी की सेवा स्वयं करते हैं जबकि उनकी सेवा उनके साथ रहनेवाली छोटी अविवाहित पुत्री करती है।

 

यह पूछे जाने पर कि भला इतने न्यून शुल्क से प्राप्त आय में आप का गुजारा कैसे होता है? वह कहते हैं मुझे जो पेंशन मिलता है वह मेरे गुजारे के लिए पर्याप्त है। आज भले ही इस पेशे में भी विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिए अधिकाधिक ‘फीस’ वसूली जाने लगी है लेकिन उनके लिए मरीजों का अच्छा होना ही ‘रिवार्ड’ है। वह कहते हैं जब मरीज पाॅंच रूपये में ही ठीक हो जाता है तो भारी फीस क्यों ली जाये। जब मरीज अच्छा हो जाता है तो खुशी होती है। दवाई का नतीजा मिलना चाहिए। डाक्टर मुखर्जी के इस कथन से ही चिकित्सा जगत में व्याप्त शोषण का पर्दाफाश होता है कि ‘सारा डाक्टर कम्युनिटी हमसे नाराज है कि क्यों मैं पांच रूपये में मरीज देखता हूॅं।’ फिर वह प्रश्न भी उछालते हैं, ‘यह कैसी मानवता है।’ डाक्टर मुखर्जी इस परिस्थिति में भी अत्यंत गरीब मरीजों से कोई शुल्क नहीं लेते है बल्कि औषधि की भी व्यवस्था कर देते हैं। वह कहते हैं ‘‘मेरा तो यह संदेश है कि हर डाॅक्टर हर रोज एक गरीब मरीज को मुफ्त में देखे और इलाज करे।’’

चुपचाप रोगियों की इमानदारी से सेवा में रत डाक्टर मुखर्जी ने अब तो अपनी उम्र खपा दी। लेकिन अपनी निजी समस्याओं को कभी बाहर नहीं आने दिया। चिकित्सकीय सेवा कर्म के साथ आम प्रशंसकों और श्रद्धालुओं की भावनाओं की भी कद्र करते रहे। जरूरत पड़ने पर सामाजिक स्तर पर जरूरतमंदों की व्यक्तिगत स्तर आर्थिक सहायता की तो कतिपय शिक्षण संस्थानों के विकास में भी यथा-सम्भव आर्थिक सहयोग दिया। फिर भी रोगियों की सेवा ही उनका मुख्य कार्य है। इस मामले में उनका हौसला आज भी बरकरार है। रोगी जब उनके सामने बैठता है तभी से वह मान लेता है कि अब उसका रोग दूर हो जायेगा। क्या पुरूष, क्या महिला, क्या बच्चे डाक्टर मुखर्जी के स्पर्श मात्र से आश्वस्त हो जाते हैं। डाक्टर को दूसरा भगवान माना जाता है। यदि यह सत्य है तो राॅंची के ‘मुखर्जी डाक्टर’ ऐसा ही हैं।

पटना में जन्में और वही पले बढ़े डाक्टर मुखर्जी ने अक्षर ज्ञान से लेकर मेडिकल की पढ़ाई तक पटना से ही की। उन्हें एक मलाल अब भी है कि पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण वह मेडिसिन में अच्छा होने के बावजूद उस विषय से एम.जी. नहीं कर पाए। फिर भी पैथोलाॅजी लेकर पढ़ाई पूरी की। लेकिन मेडिसिन से वह विलग नहीं हुए। 1957 में मेडिकल की पढ़़ाई पूरी हुई। उनके सहपाठियों में डाक्टर सी पी ठाकुर आज भी घनिष्ट मित्रों में शामिल हैं। डाक्टर ठाकुर की शादी में तब डाक्टर मुखर्जी मुजफ्फरपुर भी गये थे। डाक्टर ठाकुर अपने बैच में प्रथम थे, तो डाक्टर मुखर्जी द्वितीय थे। यह चर्चा साक्षात्कार में स्वयं डाक्टर मुखर्जी ने गर्व पूर्वक किन्तु शालीनता से की। उन्होंने इस तथ्य को भी नहीं छिपाया कि ‘पैथोलाॅजी के साथ उन्होंने मेडिसिन की प्रैक्टिस को नहीं छोड़ा और रोगियों का वह शुरू से इलाज करते रहे क्योंकि मेडिसिन के ज्ञान में वह कभी कमजोर नहीं थे।


1959 में सरकारी नौकरी में आये डाक्टर मुखर्जी बिहार के आरा में सिविल सहायक सर्जन पद पर बहाल हुए। क्रमशः कई पदों पर सेवा के बाद वह 1966 में राॅंची स्थित तत्कालीन राजेन्द्र मेडिकल काॅलेज अस्पताल अब रिम्स में पैथोलाॅजी विभाग में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए। 1966 से 1993 तक राॅंची मेडिकल काॅलेज में अपनी लंबी सेवा देने के उपरान्त माइक्रोबायोलाॅजी के विभागाध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण किया। वह बताते हैं कि भारतीय चिकित्सा परिषद् (एमसीआई) के निर्देश पर 1983-84 में विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के लिए पैथोलाॅजी को दो विभागों पैथोलाॅजी और माइक्रोबायोलाॅजी में विभाजित किया गया।

तब डाक्टर मुखर्जी पैथोलोजी के अध्यक्ष पद से स्थानांतरित कर माइक्रो बायोलाॅजी विभाग के अध्यक्ष बनाये गये। जहां अवकाश ग्रहण तक सेवा में रहे।
डाक्टर मुखर्जी ने राॅंची के लालपुर चैक के निकट 1973 में ही एक पुराना मकान खरीद कर अपना आशियाना बना लिया था जहां अब भी सेवा के साथ जिन्दगी गुजर रही है। भावना आयी कि रोगियों को देखना है, तो देखने लगा और 52 वर्ष पूर्व शुरू हुई यह सेवा बिना रूके आज भी कर्तव्य के रूप में अंगीकार है।
डाक्टर मुखर्जी को संतोष है कि वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर भी वह रोगियों की सेवा देने में सक्षम हैं। वह ‘विश्वास पात्र’ बनकर रोगियों से बात करते हैं। यही कारण है कि उनके पास अनेक धनाढ्य रोगी भी पहुंच जाते हैं लेकिन वही पाॅंच रूपये की फीस उनसे भी ली जाती है। राॅंची से बाहर से रोगी भी ‘मुखर्जी डाक्टर’ की शोहरत सुनकर आते हैं और खुश होकर जाते हैं। झारखण्ड के सुदूर क्षेत्रों सहित बिहार के गिरिडीह, कोडरमा, पटना, आरा, विक्रमगंज आदि स्थानों (जिन स्थानों का नाम डा0 मुखर्जी को यादा आया) से आते हैं। सही इलाज की आशा में आते हैं और निरोग होकर लौटते हैं। क्रोनिक बीमारियों से पीड़ित रोगी भी डाक्टर मुखर्जी के इलाज से ठीक होते हैं। डाक्टर मुखर्जी गर्व से कहते हैं-‘तब हम बहुत अच्छा महसूस करते हैं।’

विगत् 20 वर्षों में राॅंची में जितने मंहगे-महंगे चिकित्सा-संस्थानों की बढ़ोतरी हुई है और लाखो-लाख रूपये का बिल थमाने पर विवाद के बहुचर्चित मामले सामने आ रहे हैं उनके बीच ‘मुखर्जी डाक्टर’ का जलवा कायम है। गरीब रोगी उनके लिए प्रार्थना करते हैं जबकि ‘मुखर्जी डाक्टर’ न जीवन के बारे में सोचते हैं और न मृत्यु के बारे में सोचते हैं। वह सोचते हैं तो शाम को निश्चित समय पर उनके क्लीनिक में पहुंचने वाले रोगियों के बारे में सोचते हैं। उनके निजी जीवन का अवसाद उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखता। वह उसे व्यर्थ मानते हैं क्यों कि लक्ष्य यदि सेवा है तो वही सार्थक है, वही पुरस्कार है।
डाक्टर मुखर्जी वैसे लोगों से विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर माफी मांग लेते हैं जो उनसे असहमत होते हैं। यही बड़प्पन ‘मुखर्जी डाक्टर’ का धन है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ सहित अन्य कई संस्थाओं द्वारा डाक्टर मुखर्जी सम्मानित हो चुके हैं। इनसे प्रभावित रिलायन्स प्रमुख मुकेश अम्बानी ने मुंबई में अपने एक विशिष्ट समारोह में आमंत्रित कर सम्मान दिया था। इसी दौरान मुकेश ने इनकी सक्रियता देखकर लंबी आयु पाने का उपाय पूछा था तो डाक्टर मुखर्जी ने सलाह दी ‘टहलिए और दिमाग को शांत रखने के लिए महामृत्युंजय जाप कीजिए।’
मुकेश अंबानी ने डाक्टर मुखर्जी का बहुत आदर किया था। उनके व्यवहार से डाक्टर मुखर्जी आज भी आह्लादित हैं। डाक्टर मुखर्जी को दिल्ली स्थित एक अन्य बहुप्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान द्वारा भी सम्मानित किया गया था। आम और गरीब रोगियों के डाक्टर, राॅंची के ’मुखर्जी’ डाक्टर अपना उदाहरण आप हैं। अन्य चिकित्सक उन्हें उदाहरण के रूप में भले स्वीकार नहीं करें।

छाया: फहीम अहमद