-धर्मराज राय

दुनिया की बढ़ती आबादी के साथ-साथ लोगों के खानपान और रहन सहन में भी परिवर्तन आया है। उसी परिप्रेक्ष्य में शरीर और मन के रोगों की विविधता और संक्रामकता में भी अभिवृद्धि हुई है। जटिल रोगों के निदान के लिए नित नये-नये अनुसंधान के साथ नयी-नयी दवाइयां भी बन रही हैं। फिर भी रोग और रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस परिस्थिति पर चिन्ता प्रकट की है। विशेषज्ञों के अनुसार मानव शरीर के अधिकांश रोग जीवन शैली और खान-पान से सम्बन्ध रखते हैं। आज के युग में भी जीवन-शैली और खान-पान में प्राकृतिक व्यवस्था की अवहेलना करना भारी पड़ रहा है। अब तो साधारण बुखार की चिकित्सा भी जटिल हो जा रही है तो प्रदूषण और दूषित पेयजल से भी स्वास्थ्य तबाह हो रहा है।


वस्तुतः हवा, पानी, भोजन और जीवन शैली ही स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन के लिए वरदान हैं। इनकी परिशुद्धता के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि विश्व स्तर पर उत्पन्न हो रहे जटिल रोगों का नित अध्ययन हो रहा है और आधुनिक दवा के साथ चिकित्सा के अतिरिक्त उपायों पर भी विचार और विश्वास कर अनुसंधान पर बल दिया जा रहा है।


वैसे पूर्व काल से ही स्वास्थ्य विशेषज्ञों की यही राय रही है कि हर नया रोग शरीर को रोग मुक्त करने की प्रकृति की विभिन्न चेष्टा मात्र है। जब शरीर तरह-तरह के दूषित पदार्थों के बोझ से दब जाता है, तब प्रकृति भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं द्वारा विकार से रहित करने की कोशिश करती है। प्रकृति की इस चेष्टा का ही नाम रोग मुक्ति है।
बीमारी की हालत में पाकस्थली की पाचनशक्ति बहुत ही कम हो जाती है। यदि किया गया भोजन किसी तरह पच भी जाए तो भी शरीर के भीतर जाकर वह पूरी तौर पर शरीर के काम नहीं आता है। बीमारी के समय शरीर के भीतर जो विष का स्त्रोत फूट पड़ता है उससे शरीर के सम्बद्ध तंत्रों की क्षमता कम हो जाती है।

शरीर के कोष शिथिल हो जाते हैं। खाद्य पदार्थ पूरी तरह ग्रहण नहीं हो पाता। तब खाद्य पदार्थ शरीर के काम नहीं आकर शरीर के लिए विषाक्त पदार्थ के रूप में परिणत हो जाता है। तब शरीर की शक्ति बढ़ने के बदले रोग की ही शक्ति बढ़ती है। यही कारण है कि सभी कालों में और सभी देशों में रोग होने पर यथासम्भव हल्का भोजन करने का ही प्रावधान है। सभी तरह के योग्य चिकित्सक तत्क्षण रोग-नियंत्रण के लिए आहार-ग्रहण पर नियंत्रण की सलाह देते रहे हैं।


प्राकृतिक चिकित्सकों ने अपने अनुभव और अनुसंधान के सुपरिणाम के आधार पर बताया है कि रोग उत्पति के साथ ही इस तरह के पथ्य का चयन करना चाहिए जिसे पचाने के लिए प्रकृति को सफाई करने के काम से विरत होकर परिपाक के लिए अपनी शक्ति का उपयोग न करना पड़े। रोग की अवस्था में रोगी की पुष्टि की तरफ ध्यान नहीं देकर उपवास के समान ही केवल किसी पथ्य की व्यवस्था करनी चाहिए।

यथा-सम्भव पथ्य का हल्का होना भी जरूरी है। हालांकि चिकित्सक यह भी हिदायत देते हैं कि पथ्य का हलका होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि पथ्य ऐसा हो जो रोग का कारण बने शरीर में उत्पन्न हुए विष को विनष्ट करे या सामान्य बनावे जिससे प्राकृतिक रूप से शरीर की सफाई भी होती रहे। यही कारण है कि पहले के चिकित्सक बीमारी की अवस्था में प्रधान पथ्य के रूप में नीबू के रस के साथ पानी, फलों का रस, रसीले फल, छेने का पानी, पतला मट्ठा फुलाये हुए किशमिश का पानी, सब्जी का पतला सूप तथा मधु-पानी का सेवन कराते थे। इससे शारीरिक शक्ति भी बनी रहती है।


प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह जानकारी आवश्यक और विश्वासप्रद है कि हर रोग में रोगी को नींबू के रस के साथ काफी मात्रा में पानी पीने देना चाहिए। हमारे शरीर में जितने प्रकार के रोगों के विष उत्पन्न होते हैं वे सभी अम्लधर्मी (एसिडिक) हैं। नींबू का रस मुंह में अम्ल धर्मी होने पर भी परिपाक के बाद वह क्षारधर्मी बन जाता है और रोग के अम्ल-विष का नाश करता है। कमला नीबू, बिजौरा नीबू आदि विभिन्न खट्टे जाति के फलों के रस से भी वही लाभ होता है जो नीबू के रस से होता है। लेकिन विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि रोग की तेज अवस्था में हमेशा ही फलों के रस के साथ पानी मिलाकर देना चाहिए। इस प्रकार काफी मात्रा में पानी पीने से रोग का विष बहुत अंशों में नष्ट हो जाता है। विष पसीना और पेशाब के साथ शरीर से निकल जाता है। रोगी को जामुन, खीरा आदि का रस भी दिया जा सकता है। नारियल का पानी भी उम्दा है। जो रोगी अम्ल रोग अर्थात एसिडीटी से परेशान रहते हैं उन्हें रोग की अवस्था में खट्टे जाति के फलों के बदले इन सभी फलों का रस ही ग्रहण करना उचित है।

रोग की अवस्था में मौसम्बी आदि रसीले फल खाने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन दूसरे प्रकार के फलों के खाने में इसका ध्यान रखना होगा कि प्रारम्भिक अवस्था में उनके छिलके बीज तथा सीठी का सेवन नहीं हो। यदि कब्जियत हो तो हमेशा फलों के रस के सेवन पर ही निर्भर रहना उपयुक्त माना जाता है। फलों का रस कब्जियत की रामवाण दवा है।


यहां एक महत्वपूर्ण सलाह यह भी दी जाती है कि भले फलों के सेवन का जो फायदा ऊपर में बताया गया है वह अपनी जगह उचित होते हुए भी रोग की परिवर्तित स्थिति में फलों के रस का सेवन मना भी है। अर्थात् यदि रोगी को पतला दस्त होता हो तो किसी भी हालत में उसे नींबू का रस, नारियल का पानी और मौसम्बी के रस को छोड़कर दूसरा कोई फल नहीं देना चाहिए। पतला दस्त होने की हालत में रोगी का मुख्य पथ्य छेने का पानी और मठ्ठा है। ये हल्के पथ्य हैं और शक्तिदायक भी हैं। रोगी के लिए दही की मलाई निकाल कर तथा अधिक पानी मिलाकर पतला मट्ठा तैयार करना चाहिए।


पेट के रोगों में मट्ठा तो दवाई का काम करता है। लेकिन रोगी की छाती में दोष होने पर रोगी को कभी भी दही या मट्ठा नहीं देना चाहिए। मलेरिया, गठिया, अम्ल रोग, छाती के दोषों में दही का सेवन एक दम वर्जित है। छाती के दोष होने पर रोगी को नारियल का पानी और बर्फ भी वर्जित है। इससे रोग बढ़ सकता है।


तरह-तरह के विटामिन एवं धातु-लवणों से युक्त तरकारी के सूप का सेवन रोगी के लिए अच्छा होता है। पालक साग, धनिया-पत्ती, पपीता, खेखसा, चुकन्दर और गाजर आदि का उबला जल रोगी के लिए बहुत बढ़िया पथ्य बन जाता है। रोग जब बहुत बढ़ा हुआ हो तो केवल तरकारी का उबला हुआ जल ही दिया जा सकता है। रोग दूर हो जाने पर पकायी हुई सब्जी को पूरी तरह मसल कर उसके गाढ़े पल्प (क्वाथ) को भी खाने के लिए दिया जा सकता है।एक बात और गौर करने की है कि बीमार पड़ते ही लोग साबूदाना और बार्ली खाने लगते हैं। लेकिन ये पदार्थ अम्लधर्मी होते हैं जबकि फल झारधर्मी हैं। इसीलिए फलों के रस पर ही ध्यान देना चाहिए।

बीमारी में कभी भी चीनी और मिश्री खाने से मना किया गया है। हमारे प्राकृतिक चिकित्सकों और प्राचीन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार चीनी और गुड़ आदि पचने में बहुत समय लेते हैं। भात-रोटी आदि की पाचन क्रिया तो मुंह से ही शुरू हो जाती है। किन्तु चीनी न तो मुंह में हजम होती है और न पाकस्थली में बल्कि यह छोटी आंत में हजम होती है। अधिक चीनी और गुड़ खाने से तरह-तरह के रोग पैदा हो जाते हैं। इसी कारण बीमारी की हालत में मीठा के रूप में मधु और भिगोए किशमिश के पानी का प्रयोग उचित माना गया है। बहुत सारे लोग रोग के साथ निर्धारित पथ्य की आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि इससे तो रोगी कमजोर ही हो जाता है। लेकिन यह विशेषज्ञों द्वारा दावे के साथ कहा जाता है कि सभी नये रोगों में कम या ज्यादा कमजोरी आती है। परन्तु यह नहीं समझना चाहिए कि यह कमजोरी हल्के भोजन के कारण होती है। रोग के कारण रोगी के शरीर में, रक्त प्रवाह में जो विष स्त्रोत चला जाता है वही रोगी को कमजोर बना देता है। जबकि विष दूर करने की चिकित्सा विधि और उचित पथ्य के कारण जैसे जैसे विष दूर होता है वैसे वैसे बाह्य और अंतरांग विष मुक्त होकर निखर आते हैं। रोगी चंगा महसूस करने लगता है। अधिक भोजन करने से रोगी जिस प्रकार सूखता जाता है हल्के पश्य से रोगी का स्वास्थ्य पहले से अधिक सुधर जाता है।

शरीर शास्त्रियों एवं रोग विज्ञानियों का कहना है कि रोग से छुटकारा पा जाने के बाद अचानक अधिक भोजन ग्रहण करने लगना हानिकारक है। पहले से चालू पथ्य को ही कुछ दिन और आगे चलाना चाहिए। धीरे-धीरे तरल पथ्य को गरिष्ठ और ठोस आहार में परिवर्तित करना चाहिए।
प्राकृतिक चिकित्सकों के अनुभव के अनुसार पुराने रोगी जब तक सबल रहें तब तक स्वस्थ अवस्था वाला भोजन ही ग्रहण करना चाहिए लेकिन रोग की गंभीर अवस्था में फलों पर आधारित पथ्य ग्रहण करना ही निरापद होता है। प्राकृतिक चिकित्सा का अवलंबन लेने वाले रोगियों के लिए चिकित्सक द्वारा निर्धारित पथ्य तेजी से स्वस्थ होने में मदद करता है।

बीमारी की हालत में सभी प्रकार के चर्बी जातीय पदार्थ, अधिक नमक, हल्दी को छोड़कर सभी प्रकार के मसाले, तले पदार्थ, दुकान के पदार्थ, चाय, काॅफी, मांस, मछली, दुष्पाच्च और उतेजक पदार्थों का सेवन त्याग देना चाहिए। इस प्रकार से पथ्य ग्रहण करने से रोग बिगड़ता नहीं है, असह्य भी नहीं हो पाता है और थोड़े समय में ही रोग से छुटकारा मिल जाता है।
आयुर्वेद भी स्थापित करता है-

बिनापि भैषजैव्र्याधि पथ्यादेव निवर्तते।
न तु पथ्य विहीनानाम् भेषजानां शतैरपि।।

बिना किसी औषधि के केवल पथ्य से ही रोग से छुटकारा मिल सकता है किन्तु बिना पथ्य के रोग सैंकड़ों औषधियों से भी नहीं छूटता।
सार रूप में हम कह सकते है कि यह शरीर एक खाद्य यंत्र है। कुभोजन से जिस प्रकार रोग की सृष्टि होती है, उसी प्रकार अच्छे खाद्य से रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसीलिए चिकित्सकों और रोगियों के बीच यह कथन भी प्रिय है कि डाॅक्टरों की अपेक्षा सुपथ्य से ही अधिक रोगी नीरोग होते हैं।
‘‘हेल्थ एण्ड लाइफ’’ के सम्पादक बर्नार्ड बर्नार्ड ने कहा है कि ‘मैं जानता हूँ कि काफी दिनों तक कमला नीबू और बीजौरा नीबू आदि फल कुछ अधिक और पालक का शाक तथा लेटुस का शाक कुछ कम खाकर बहुत से यक्ष्मा, दमा, गठिया, मधुमेह एवं यहां तक कि मिरगी के रोगी भी अच्छे हो गए हैं।’’