-दी राईटर

सम्पूर्ण विश्व में सुविख्यात और विश्व साहित्य भंडार के पद्यबद्ध ग्रंथों में सबसे वृहद एवं ‘स्थूलकाय’ भारतीय सद्ग्रंथ ‘महाभारत’ का अपना विशिष्ट स्थान है। यह संस्कृत भाषा का महाकाव्य-महाग्रंथ है।

यह ग्रंथ अठारह भागों में विभक्त है। इसके प्रत्येक भाग को ‘पर्व’ कहते हैं। इन अठारह पर्वों में से एक का नाम ‘भीष्मपर्व’ है। इसी भीष्म पर्व में एक छोटा सा भाग है जिसे ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के रूप में पवित्र मन से याद किया जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता का अर्थ ‘भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत है।

इसलिए इसकी पद्यात्मक भाषा में तार द्वारा भेजे गये संदेश की सी संक्षिप्तता है। श्रीमद्भगवद्गीता में केवल 700 श्लोक हैं और 9,456 शब्द हैं। इन्हीं नौ हजार चार सौ छप्पन पद्यबद्ध शब्दों में उपनिषदों का सारांश है। इसीलिए महाभारत के इस भाग की बड़ी महत्ता है। इस भाग को ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ नाम से ही अलग से पुस्तक रूप में प्रकाशित कर बहुपयोगी और बहुपठनीय बना दिया गया है। यह भारत की अध्यात्म विद्या की सबसे बड़ी देन है। यह सर्वमान्य है कि भारत आदि काल से ही अध्यात्म ज्ञान और योग विद्या का ज्ञाता देश रहा है। भारत के हजारों साल के इतिहास में कोई एक उदाहरण नहीं है कि अध्यात्म और योग सिखाने के लिए कोई भी गुरु यहां बाहर से आया हो।

बल्कि उपर्युक्त विधाओं के गुरु समय-समय पर इसी देश में उत्पन्न होते रहे हैं। प्रसन्नता, उल्लास, श्रद्धा और विश्वास की बात तो यह है कि हजार वर्ष की गुलामी से दीनापन्न भारत में भी इन विद्याओं के जानकार गुरु पूर्ववत् होते रहे हें।

विदेशों के इमानदार अध्येता भी इस सत्य-तथ्य को स्वीकार करते हुए भारत की आध्यात्मिक उर्जा के प्रति नतमस्तक रहे हैं।

यह सत्य समाचार है कि भारत के स्वतंत्र होने के कुछ ही वर्ष पूर्व श्री पाल ब्रन्टन नामक एक प्रतिष्ठित अंग्रेज विद्वान योग विद्या के जानकारों की खोज में भारत आये और यहां कुछ माह ठहर कर जो कुछ भी जानकारी बटोर पाये, उससे वह संतुष्ट होकर स्वदेश लौटे। वस्तुतः भारत को सर्वाधिक गौरव उपर्युक्त विधाओं के ज्ञान पर है और इन विद्याओं को ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ पर गौरव है।


भारत के बड़े-बड़े साधक और आचार्य ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का सहारा लेकर ज्ञान प्रचार द्वारा भारत एवं विश्व का आध्यात्मिक कल्याण करते रहे हैं। परिणाम स्वरूप यह पुस्तिका भारत के साथ-साथ विश्व में वंदनीय हो चुकी है। विश्व की समुन्नत लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद निकलता रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में जगद्गुरु भारत के प्रत्येक नागरिक का यह नैतिक कत्र्तव्य है कि वह इस सद्ग्रंथ का तात्पर्य स्वयं भी समझे और अन्यों को भी समझावे। इस उत्तरदायित्व को निबाहने में तनिक भी प्रमाद, भ्रम या असावधानी न केवल भारत बल्कि विश्व की आध्यात्मिक उन्नति के लिए घातक है।


उपरोक्त परिचयात्मक भूमिका के उपरांत प्रश्न यह उठता है कि आखिर ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का जिसे संक्षेप में ‘गीता’ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है, सही तात्पर्य क्या है? ऐहिक और पारमार्थिक कल्याण साथ-साथ करते हुए मनुष्य कैसे समता प्राप्त करे और किस तरह कर्म करता हुआ समाधिस्थ हो स्थितप्रज्ञता तक पहुंच सके, इसी के साधन गीता में बहुत ही युक्ति पूर्वक रीति से बतलाये गये हैं। इस साधन कीपूर्ति के लिए योग का अभ्यास अतिआवश्यक है। इस प्रसंग में यही पर ‘योग’ शब्द की सफाई में कुछ कहना आवश्यक हैं


‘गीता’ के अठारह अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय के साथ ‘योग’ शब्द लगा हुआ है, यथा-अर्जुन-विषाद योग, सांख्य योग, कर्मयोग इत्यादि। इससे गीता के पाठकों और जिज्ञासुओं को ज्ञात होता है कि इसमें केवल योग-ही-योग है। लेकिन यह जानकारी देना उचित है कि ‘गीता’ में केवल योग की ही बात नहीं है बल्कि कैसे बैठना चाहिए, कितना खाना चाहिए और कितना सोना चाहिए आदि बातों पर भी पालन करने की चर्चा है। यहां यह भी स्पष्ट करना जिज्ञासुओं के लिए आवश्यक है कि गीता में ‘योग’ शब्द का एक ही अर्थ में प्रयोग नहीं है। महर्षि पंतजलि अपने पातंजल-योग-दर्शन में चित्तवृत्ति निरोध को योग कहते हैं। गीता में भी चित्तवृत्ति-निरोध के अर्थ में योग शब्द आया है लेकिन उसके अन्य दूसरे-दूसरे अर्थ भी गीता में हंै जैसे अर्जुन विषाद्-योग। यहां योग शब्द का अर्थ ‘युक्त होना’ है। अर्जुन विषाद् युक्त हुआ, इसी का वर्णन प्रथम अध्याय में है। इसीलिए उस अध्याय का नाम ‘विषाद योग’ हुआ। जिस विषय का वर्णन कर óोत को उससे युक्त किया गया, उसको तत्सम्बन्धी योग कहकर घोषित किया गया।
गीता के अध्याय-2 के श्लोक 48 में कहा गया है कि ‘‘समत्वं योग: उच्यते’’-अर्थात् समता का ही नाम ‘योग’ है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यहां योग शब्द का अर्थ समता है। पुनः उसी अध्याय के श्लोक 50 में कहा गया है कि -‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’-अर्थात् कर्म करने की कुशलता या चतुराई को योग कहते हैं। यहां योग शब्द का अर्थ उपर्युक्त अर्थों से भिन्न, एक तीसरे ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।


अतएव गीता के तात्पर्य को समझने के लिए ‘योग’ शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थों को ध्यान में रखना चाहिए। हालांकि ‘गीता’ स्थितप्रज्ञता को सर्वोच्च योग्यता कहती है और उसकी प्राप्ति का मार्ग बतलाती है। स्थितिप्रज्ञता, बिना समाधि के सम्भव नहीं है। इसीलिए गीता के सभी साधनों के लक्ष्य को समाधि कहना अयुक्त या निरर्थक नहीं है।
इन साधनों में समत्व-प्राप्ति को बहुत ही आवश्यक बतलाया गया है। समत्व-बुद्धि की तुलना में केवल कर्म बहुत तुच्छ है। (गीता-2/49) इसलिए समतायुक्त होकर कर्म करने को कर्मयोग कहा गया है। यही ‘योगः कर्मशु कौशलम्’ है। अर्थात कर्म करने की कुशलता को योग कहते हैं। गीता में समझाया गया है कि कर्म करने का कौशल यह है कि कर्म तो किया जाये, परन्तु उसका बन्धन नहीं लगने पाये। यह समता पर निर्भर करता है। वस्तुतः गीता न सांसारिक कत्र्तव्यों से हटाती है और न कर्म बन्धन में रखती है। समत्व योग प्राप्त कर, स्थितप्रज्ञ बनकर, कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ता से आरूढ़ रहकर कत्र्तव्य कर्मों के पालन का उपदेश गीता देती है।


गीतोपदेश के मर्म को समझनेवाले तत्वदर्शियों का मानना है कि ‘समत्व-प्राप्त स्थितप्रज्ञ पुरूष कर्म करने में कुशल, सांसारिक कर्मों में फल की आशा से असंग रहता हुआ, कर्म-बंधन-रहित होकर उन कर्मों को जीवन भर करे और इस तरह जीवनमुक्त बन जाय – यही कर्म योग गीता सिखलाती है। कर्मयोगी के लिए समत्व और स्थितप्रज्ञता अत्यन्त आवश्यक बतलाये गये हैं। ये दोनों समाधि साधन में ही प्राप्त होते हैं (गीता-2/53)। यही विदित होता है तथा गीता अध्याय-2, श्लोक 54 में तो समाधिस्थ और स्थितप्रज्ञ का कथन निर्भेद भाव में किया गया है। सारांश रूप में एक बार पुनः समझ लेने में कोई हर्ज नहीं है कि गीता में बतलाये गये तमाम साधनों का अंतिम लक्ष्य समाधि है। समाधि साधन के लिए जिन योगों की आवश्यकता है उन सबका समावेश गीता में है। गीता-शास्त्र में ज्ञानयोग, ध्यानयोग, प्राणायाम योग, जपयोग, भक्तियोग, कर्मयोग आदि सभी योगों की भरपूर उपादेयता है। सब एक दूसरे से सम्बद्ध हैं जैसे माला की मणिकाएं। गीता में अध्यात्म के मार्ग पर चलने के लिए बताये गये योग की सार्थकता सभी युगों में है। जीवन के पार के रहस्य को समझने के लिए योग ही एकमात्र साधन है।


किसी का यह कहना अज्ञानता है कि ‘अब ध्यान-योग के अभ्यास करने का युग नहीं है।’ यदि ऐसा कोई कहता है तो यही विदित होता है कि देश का अमंगलकाल चला आया है। आध्यात्मिक-महापुरूषों की उद्घोषणा है कि गीता का ज्ञान जन-साधारण के लिए ही है। साधारणतया यह मान लिया गया है कि गीता साधु-संन्यासियों के व्यवहार की चीज है किन्तु स्वयं गीता सबको गीता ज्ञान का अधिकारी मानती है। यहां स्वर्ण, अवर्ण, स्त्री, शूद्र, पापी और दुराचारी सभी के लिए गीता-गंगा का जल-रूपी उपदेश समान रूप से सुलभ है। (गीता-अध्याय 9, श्लोक 30 से 32 तक)

यह विडंबना पूर्ण बात है, जब कुछ लोग यह कहते हैं कि अध्यात्म-साधन के लिए गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि परमात्मा ही गुरु है। जबकि गीता के चैथे अध्याय में स्पष्ट लिखा है-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः।।34।।

तत्त्व को जाननेवाले ज्ञानी पुरूषों से भली प्रकार दण्डवत-प्रणाम तथा सेवा और निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जान मर्म को जाननेवाले वे ज्ञानी जन तुझे ‘उस ज्ञान’ का उपदेश करेंगे।
गीता में ही स्पष्ट है कि ‘अमानित्व (मान का अभाव), दंभ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य (गुरु) की सेवा, शुद्धता, स्थिरता, आत्मसंयम आदि यह सब ज्ञान कहलाता है।’
‘‘देव, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शारीरिक तप कहलाता है।’’
भारतीय अध्यात्म क्षेत्र में उपनिषद् आदि ग्रंथों से लेकर अर्वाचीन साधु संतों ने गुरु के महत्व को स्वीकार किया है। गीता इस विचार से पीछे नहीं है।