आज भी भूत-प्रेत पर देश में है लोगों का विश्वास

-दी राईटर

रोगों के निदान और और आरोग्य लाभ से जीवन सुखकर होता है। अभी तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का दबदबा है। नये-नये अनुसंधानों से चिकित्सा विज्ञान समृद्ध हुआ है। फिर भी महंगी चिकित्सा का लाभ बहुसंख्य पीड़ितों तक समुचित रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। फिर भी, किसी भी रोग से बीमार हो जाने पर लोग इलाज के लिए चिकित्सा-विशेषज्ञों तक पहुंचते ही हैं। आजकल तो बड़े-बड़े अस्पताल और नाम कमाने वाले चिकित्सक रोगियों की सेवा में संलग्न हैं। लेकिन हमारे देश में ही आधुनिक चिकित्सा पद्धति, जिसे ठेठ बोली में ‘अंग्रेजी चिकित्सा’ कहते हैं, का प्रचार और प्रसार बहुत कम था।

लोग वैद्यों और हकीमों के अतिरिक्त दादी-नानी के नुस्खों पर निर्भर रहकर अपना इलाज कराते थे। गांव-गिरान में कोई न कोई जड़ी-बूटियों का ऐसा जानकार निकल आता था जिसपर विश्वास कर लोग उससे अपने रोग का इलाज कराते थे। आज यदि नीम-हकीम हैं तो कल भी इस तरह के लोग होते थे। तब भी लोग झाड़-फूक कर रोगों को भगाने में विश्वास करते थे तो आज भी इस प्रवृति और इससे अनुचित लाभ उठाने वालों की कमी नहीं आयी है। यदि इस तरह के अंधविश्वास और कुप्रथा से लोग मुक्त हो गए होते तो देश के कई क्षेत्रों में ‘भूत’ भगाने के मेले नहीं लगते जहां कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्थानीय प्रशासन को सक्रिय रहना पड़ता है। ऐसे मेलों में एक से बढ़कर एक ओझा-गुनी और ‘भूत’ विशेषज्ञ अपने जाल में फंसा कर भूत भगाने का दावा कर निरोगी करने का धंधा करते हैं।

लोगांे के अंधविश्वास के आगे समाज विज्ञानी, अध्यात्म विज्ञानी, वैद्य, हकीम, बड़े-बड़े ‘अंग्रेजी डाॅक्टर’ की कौन कहे सरकार की भी कुछ नहीं चलती है। झारखंड प्रदेश में डायनप्रथा की जड़ आज भी इतनी गहराई तक जमी हुई है कि आये दिन कथित तौर पर डायन-महिलाओं और ओझा-गुनियों की नृशंस हत्याएं होती रहती हैं। इस सम्बन्ध में यहां डायन प्रतिषेध अधिनियम भी बना हुआ है लेकिन इसका किंचित सकारात्मक प्रभाव इस सामाजिक-वैयक्तिक अज्ञानता से उत्पन्न कुप्रथा पर नहीं पड़ रहा है। इस तरह की चिकित्सा पद्धतियों के अस्तित्व में रहने के कारण उत्पन्न विसंगतियों के साथ-साथ आधुनिक चिकित्सा से वंचित लोगों की आज भी जड़ी-बुटियों और घरेलू इलाज में विश्वास है।

दादी-नानी के नुस्खे के रूप में जिस तरह की चिकित्सा आज से 100-50 वर्ष पहले होती थी वह आज भी देखने को मिलती है। तब रसोई घर में मौजूद कई पदार्थों से ही रोगों का निदान होता था। गांव परिवार की विशेषज्ञ प्रौढ़ महिलाएं या गांव के जड़ी बूटी विशेषज्ञ दादा-चाचा अपने अनुभव ज्ञान से पेड़ों के फल-फूल, जड़-मूल-पत्ती के द्वारा हर प्रकार की बीमारियों का इलाज करने के लिए आगे बढ़कर आ जाते थे। तब ‘वैद्य जी’, ‘हकीम जी’ का ही वर्चस्व और नाम था। यदि हम कहें कि दैहिक, दैविक और भौतिक तापों, जिन्हें त्रयताप (तीन ताप) भी कहते हैं, का निदान या तो ‘ईश्वर के हाथ’ में था या वैद्य-हकीम के बाद दादी-नानी के नुस्खों में था। सांप और बिच्छू काटने पर मंत्रों के द्वारा गांवों में इलाज होता था जो आज भी जारी है।


परिस्थितियां ऐसी हैं कि आज भले आधुनिक अस्पतालों में और ‘अंग्रेजी चिकित्सकों’ के यहां रोगियों की भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन उसी अनुपात में अज्ञानता, दरिद्रता और साधनहीनता के कारण देश के लाखों लोग उन्हीं परम्परागत चिकित्सा पद्धति के फेर में फंसे रहते हैं जो शोधपूर्ण आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अविर्भाव से पूर्व प्रचलित थी। हालांकि इस विसंगति के लिए सरकार की उदासीनता और समुचित व्यवस्था का अभाव है। यहां एक बात और भी गौर करने लायक है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जिन औषधीयों का प्रयोग हो रहा है उनके ‘साइड इफेक्ट’ से चिकित्सक और रोगी दोनों परेशान हैं। एक रोग की चिकित्सा में प्रयुक्त औषधी के कुप्रभाव से शरीर में दूसरा रोग उत्पन्न हो जाता है।

पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति सहित अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में प्रयुक्त औषधीयों का ऐसा कुप्रभाव पहले नहीं दिखता था और आज भी नहीं दिखता है। वैसे ‘अति सर्वत्र वर्ययेत’ तो कहा ही गया है। किसी भी पदार्थ का अति सेवन वर्जित है। भोजन भी पेट से कम ही खान का प्रावधान है। फिर औषधीयां तो विशिष्ट होती ही हैं। हमारे ऋषि-मुनियों और चरक, सुश्रुत जैसे वैद्यों ने भी साफ-साफ कहा है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन।’ अर्थात् भोजन के प्रकार और विविधता का प्रभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पड़ता ही है।


स्वामी अक्षयआत्मानन्द का कहना है कि ‘सांसारिक जीवन में श्रेष्ठ सफलताएं अर्जित करना चाहो या फिर गहन योग-साधना करना चाहो-दोनों के लिए शारीरिक और मानसिक क्षमताओं में संतुलन अनिवार्य है। भोजन से यह संतुलन बनता है और असंतुलित भी होता है। भोजन के तत्वों का प्रभाव पड़ता है मन पर। मन में यदि दूषित भावनाएं जन्म लेती हैं तो हमारा आचरण और व्यवहार भी वैसा ही दूषित हो जाता है।’
इस तरह अब यह प्रमाणित हो चुका है कि बाजार में बिकनेवाले अधिकांश कृत्रिम पदार्थ जैसे शरबत, मिठाइयां, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, परिस्कृत चावल, आटा, मैदा, विविध पेय आदि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए घातक हैं। बच्चों में आपराधिक प्रवृति का जन्म भी इस तरह के बाजारू खाद्य पदार्थों के उपयोग से होता है। बच्चों की मानसिकता भी दूषित हो जाती है।

यहां एक बात और भी प्रमाणित हो रही है कि अभी सभ्य और आधुनिक कहे जाने वाले लोग और ऐसे परिवार ही स्वास्थ्य के परमशत्रु बनी वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग कर रहे हैं जिससे ललचाकर उनसे निम्नवर्ग के लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। शराब और अन्य नशीली वस्तुओं के साथ मांसाहार का अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य का शत्रु और जानलेवा है। जीवन शैली की विपरीतता से अनेक लाइलाज रोग उत्पन्न हो रहे हैं जिनसे आराम पाने के लिए दवा के साथ-साथ जड़ी-बुटियों के सेवन और योग-प्राणायाम का सहारा लाभदायक माना जा रहा है। असंतुलित आहार का त्याग कर संतुलित आहार पर ध्यान देना सभ्य समाज के लिए हितकर है। भूखमरी तो स्वयं महामारी है जिसपर नियंत्रण के लिए सरकार और उसकी व्यवस्था जिम्मेदार है।


प्राचीन भारत के महान स्वास्थ्य विशेषज्ञ वाणभट्ट ने अपने शिष्यों के इस प्रश्न-निरोगी कौन? के उत्तर में मात्र इतना ही कहा-हित भुक, मित भुक। मतलब जो व्यक्ति स्वास्थ्य के लिए हितकर पदार्थ ही ग्रहण करता हो और भूख से कम खाता हो, वही स्वस्थ और दीर्घायु होता है। वाणभट्ट ने अपने आयुर्वेदिक ग्रंथ में भी लिखा है……

अन्नेन कुक्षैध्र्दावंशी पाने नेक प्रपूरयेत।
आश्रय पवनादीना चतुर्थमवशेष येत।।

अर्थात पेट का आधा भाग अन्न आहार से भरते ही भोजन रोक दें। कुछ समय बाद पेट का एक तिहाई भाग पानी से भरें। शेष चैथाई भाग वायु के लिए खाली छोड़ दें। जो व्यक्ति इस प्रकार ‘मिताहार’ और ‘हिताहार’ करेगा उसका तन और मन सदैव स्वस्थ तथा सक्षम बना रहेगा।
इस सम्बन्ध में एक बड़े चिकित्सक का भी निजी विचार है कि रोग चाहे जिस नाम से जाना जाए और उसके उपचार के लिए चाहे जो दवा ,खायी जाए-रोग की उत्पति का मूल कारण है अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार खान-पान और रहन-सहन के तौर तरीके अर्थात् जीवन शैली। चिकित्सा साहित्य में दर्ज अनेक चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुभव और अभिमत भी चैंकाने वाले हैं। डा0 मैकफेडन कहते हैं-भूख से जितने लोग नहीं मरते उससे कई गुना लोग अनावश्यक और अधिक खाने से मरते हैं। डाक्टर हर्न (आस्टेªलिया) का कथन है- लोग जितना खाते हैं उसका एक तिहाई भी पचा नहीं पाते। पचाने की दवा लेने हमारे पास आते है। दवा लेते-लेते तंग आकर मौत की गोद में मीठी नींद सो जाते हैं। इस तरह भारतीय संत, चिकित्सा विशेषज्ञ या आधुनिक आहारविद् सभी आहार-सुधार पर बल देते हुए रोग होने पर समुचित औषधि का सेवन करने की सलाह देते हैं। रोगों से बचाव के लिए सुनिश्चित जीवन शैली अपनाने को कहते हैं। शरीर के स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक जीवन चक्र का अनुसरण करना चाहिए। कहा गया है-

प्रातः काल खटिया से उठे, पीवे तुरतै पानी
घर में कबहूँ वैध न आवै, बात घाघ ने जानी ।।
फिर यह भी-
प्रातः काल करै स्नाना, रोग दोष एकौ नहिं आना।

नियमित जीवन शैली, आहार-विमर्श और स्वास्थ्य रक्षा के लिए सचेत प्राचीन चिकित्सा पद्धति के अवदान के बावजूद आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का भी आभारी होना जरूरी है क्योंकि उसके शोध से किसी भी पद्धति से इलाज में औषधि की मात्रा निर्धारित करने में मदद मिली है।