प्राकृतिक जीवन शैली का लोप होना बना अभिशाप

दी राईटर

अगर हम देश-विदेश के सयाने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बातों पर गौर करें तो यह सही साबित होता है कि जानवरों की तरह मनुष्य भी प्रकृति के साथ जितना अधिक सीधे सम्पर्क में रहता है वह उतना ही अधिक स्वस्थ रहता है। पहले की ग्रामीण सभ्यता निश्चित रूप से प्रकृति की अनुगामी थी। कृत्रिमता न्यून थी। सादा भोजन-उच्च विचार की अवधारणा आज की नहीं है। पहले, बहुत पहले से स्वीकार्य रहता आया है। आज विचित्र-विचित्र रोगों की उत्पति और विभिन्न सार्थक मर्यादाओं के क्षरण से उत्पन्न विभिन्न विकृतियों से मानव समाज दुर्दशा में फंस रहा तो इसका एकमात्र कारण प्रकृति के साथ सामंजस्य का अभाव है।


एक विशेषज्ञ का कहना है कि ‘मनुष्य जितने रोगों से पीड़ित होता है, वन के पशु-पक्षी उतने रोगों से पीड़ित नहीं होते हैं। इसीलिए यह भी कहना गलत नहीं है कि पृथ्वी पर मनुष्य ही सबसे अधिक रोगी प्राणी है। इसके विपरीत वन के पशु-पक्षी जीवन के अंत तक यौवन क्षमता बनाए रखते हैं। मुक्त प्रकृति की गोद में सदैव निवास करने के कारण ही वे ऐसी स्वास्थ्य सम्पदा को प्राप्त करते हैं।’


स्वास्थ्य रक्षा के बहुमूल्य कारकों में प्राकृतिक रूप से प्राप्त वायु का सेवन मनुष्य सहित सभी पशु पक्षियों के लिए पूर्ण लाभदायक और आवश्यक है। इसीलिए प्राचीन काल से आधुनिक काल तक ‘हवाखोरी’ स्वास्थ्य की दृष्टि से पारंपरिक आदत के रूप में स्वीकार है। अधिक से अधिक खुली हवा में रहना एक ऐसी जीवन शैली है जो दीर्घ जीवन प्रदान करती है।


सभ्यता और संसाधनों के विकास के साथ मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी कृत्रिम वातावरण में दिन का अधिकांश समय गुजार रहे हैं। खुली हवा से भेंट नहीं होती। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक जीवन शैली का लाभ नहीं मिल पाना अभिशाप बन गया है।


हवाखोरी अर्थात् वायु स्नान से प्रधानतः इसलिए लाभ होता है कि ठंडी हवा के स्पर्श से चमड़ा के स्नायु उद्दीप्त हो उठते हैं एवं स्नायुओं द्वारा यह उद्दीपन शरीर के आंतरिक भागों में पहुंच कर उसके समस्त यंत्रों को उद्दीप्त कर देते हैं। इसके परिणाम स्वरूप शरीर का क्षय तथा गठन करने का काम शीघ्र होता है, स्नायु स्वस्थ तथा सबल होते हैं तथा नींद अच्छी आती है। स्नायु यंत्र ही शरीर के प्रधान परिचालक हैं। ठंडी हवा के स्पर्श से शरीर के स्नायु जब शांत और स्वस्थ होते हैं, तब ही शरीर के समस्त यंत्रों का काम ठीक तरह से चलता है।


वस्तुतः यथासंभव नंगे बदन पर खुली हवा का स्पर्श ग्रहण करने का ही नाम वायु स्नान या वायु सेवन है। वायु स्नान और आरोग्य का सम्बन्ध अन्योनाश्रित है। श्वास के साथ शुद्ध वायु लेने से जैसा लाभ होता हैं, नंगे चमड़े पर ठंडी हवा के स्पर्श से भी वैसा ही लाभ होता है। एक सुप्रसिद्ध चिकित्सक फ्रांसिस मेरीन पाॅटेन्जर का निर्देश है कि वायु स्नान से तभी लाभ होता है, जबकि बाहरी हवा शुष्क और गति युक्त हो तथा शरीर की अपेक्षा ठंडी हो। बाहरी हवा जब इस प्रकार की हो तभी वायु स्नान लेना उचित है।


इस तरह का स्नान लेते समय शरीर हमेशा गरम रहे एवं शरीर में रक्त का आवागमन ठीक रहे, इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक है। यदि ऐसे समय ठंड लगे अथवा शरीर ठंडा हो तो बिना किसी विलम्ब के हाथ से जल्दी-जल्दी शरीर को रगड़ना आवश्यक है। इस प्रकार रगड़ने से अत्यन्त ठंडी हवा भी नुकसान नहीं करेगी और न शरीर का अनिष्ट होगा। इसे चिकित्सा विज्ञानी चर्म घर्षण व्यायाम कहते हैं। यह स्वास्थ्य रक्षा का एक श्रेष्ठ उपाय है।


साधारण तौर पर प्रतिदिन आधे घंटे तक वायु स्नान करना काफी माना जाता है। हालांकि इसका कोई निश्चित समय भी नहीं हैं जितनी देर तक खुली हवा में रहा जा सके उतना ही अच्छा है। गर्मी प्रधान देशों और क्षेत्रों में रात दिन सारे समय शरीर का ऊपरी भाग नंगे रखकर आंशिक रूप से वायु स्नान लिया जा सकता है। जहां हवा नहीं चलती हो वहां पंखे से भी वायु स्नान का लाभ लिया जा सकता है। रात को भी खुली हवा में सोया जा सकता है। गरमी के दिनों में खुले आकाश के नीचे सोने में कोई हर्ज नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बाहर खुले आकाश में सोते ही हैं। शहर में भी लोग खुली छत पर सोते हैं। खुली हवा में सोने पर पहले-पहल सर्दी सा अनुभव हो सकता है लेकिन अभ्यास हो जाने पर सर्दी लगना बंद हो जाता है। अनुभवी चिकित्सकों का दावा है कि बहुत पुरानी और असह्य सर्दी केवल बाहर सोने से ही ठीक हो जाती है।

घर में सोने पर खिड़कियां खोलकर सोने से भी वायु का प्रवाह होने से लाभ होता है। वस्तुतः वायु स्नान जिस प्रकार स्वास्थ्य रक्षा का एक प्रधान उपाय है उसी प्रकार रोग की हालत में भी यह फलप्रद है। वास्तव में रोग जितना अधिक गंभीर हो, उतनी ही अधिक रोगी को खुली हवा की आवश्यकता होती है। किन्तु अस्वस्थ शरीर पर वायु स्नान का प्रयोग विशेष सावधानी से करने का भी निर्देश विशेषज्ञ चिकित्सक देते हैं। वह बताते हैं कि कई लोग ठंड लग जाने के भय से रोगी को हमेशा ढके रहते हैं। लेकिन गरमी से छटपटाते रोगी को ढके रहने से नुकसान होता है। इससे अन्दर की गरमी बाहर नहीं आने पाती है। यह गरमी रोगी के शरीर में ही रह जाने से रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। इसलिए जब रोगी शरीर ढकना नहीं चाहता तो उसके शरीर से ओढ़ना हटा ही देना खहिए। सावधानी पूर्वक वायु सेवन ही रोग के निदान में लाभदायक है। वायु स्नान के बाद भी शरीर की गर्मी की जाॅंच कर लेनी चाहिए। शरीर जरा भी ठंडा होने पर रगड़कर फिर गरम कर लेना उचित है।


वायु स्नान के साथ श्वास-प्रश्वास का व्यायाम करने से इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है। इससे शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। बीच-बीच में हवा बदलने से अधिक लाभ होता है। इसीलिए लोग पर्यटन पर जाते हैं। इससे अनेक रोग भी ठीक हो जाते हैं। इससे अनेक आदत लग जाने पर ज्यादा ठंड लगने पर भी कोई नुकसान नहीं होता है। फेफड़े सम्बन्धी रोगों में खुली हवा का स्नान शुरू से ही फायदेमंद माना जाता रहा है। यक्ष्मा रोग और दमा के रोगी भी वायु स्नान से लाभान्वित होते हैं। कुकुर खांसी की प्रारम्भिक अवस्था में जितनी देर तक खुली हवा में रहा जाए उतना ही खांसी का जोर कम हो जाता है। गरम हवा फेेफड़े को कमजोर बनाती है। स्नायविक रोगियों के लिए वायु स्नान पूर्ण हितकर है। अनिद्रा रोग के लिए भी वायु स्नान रामबाण है। इस तरह सभी रोगों के निदान में वायु स्नान कारगर है। कहा भी गया है, ‘सौ दवा एक हवा!