जानवर भी स्फूर्ति के लिए करते हैं परस्पर क्रीड़ा

-दी राईटर

शरीर को सक्षम और चुस्त बनाये रखने के लिए व्यायाम प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक बताया गया है। ऐसा नहीं है कि इसके महत्व को केवल मनुष्य ही समझते हैं। पशु-पक्षी और तमाम अन्य जीव जन्तु भी उछलकूद कर स्वयं को चुस्त-दुरूस्त रखते हैं। वृक्ष-लताओं का हिलना डोलना भी उनके लिए एक तरह का व्यायाम ही माना जाता है। हवा और वर्षा के प्रभाव से पेड़-पौधों को हिलते-डोलते देखकर हम उनकी मजबूती का अंदाज हमेशा लगाते हैं। जीव-जन्तु भी आहार खोजने के लिए दौड़ते हैं। आक्रमण और आत्मरक्षा के क्रम में भी उनकी उछलकूद व्यायाम का ही हिस्सा है। जानवर भी परस्पर क्रीड़ा करते हैं। इससे उनमें स्फूर्ति बढ़ती है।


व्यायाम से शरीर के विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जिससे शरीर का स्वास्थ्य सुधरता है। इसीलिए व्यायाम को एक प्रकार से नाशकारी कार्य माना जाता है। अनेक सुविख्यात शरीर विज्ञानियों और प्राकृतिक चिकित्सकों की पहले से ही ऐसी सकारात्मक राय बनी हुई है। व्यायाम के दौरान जब हम अपनी मांसपेशी को संकुचित करते हैं तब तमाम अनुपयोगी जीवकोष और दूषित विकार खून के साथ बाहर हो जाते हैं। पुनः जब हम उन मांसपेशियों को अधिक फैलाते हैं तब खून अपने साथ शरीर गठन के लिए आवश्यक नई सामग्री लेकर आता है। सृष्टि और विनाश का ऐसा अद्भुत कार्य हमारे शरीर में हमेशा चलता रहता है। मृत जीवकोष शरीर से बाहर हो जाने के कारण ही नये जीवकोष स्थान लेते हैं।


शरीर विज्ञानियों का मानना है कि जिस तरह हाथ से काम करने वालों के हाथ और अन्य विशिष्ट अंगों से काम करनेवालों के वे अंग अधिक सक्रिय और पुष्ट हो जाते हैं। उसी तरह सुव्यवस्थित और नियमित व्यायाम करने से सम्पूर्ण शरीर और उसके भीतर अर्थात अन्तर-अंग भी पुष्ट और स्वस्थ हो जाते हैं। साइकिल चलाना भी एक व्यायाम है, जिसके अभ्यासी स्वस्थ रहते हैं। व्यायाम से तमाम अंग ही नहीं शरीर के समस्त अणु-परमाणुओं तक स्वस्थ और शुद्ध खून का संचार होता है। जहां खून जाता है वही नये जीवन का प्रारम्भ होता है। व्यायाम द्वारा मरा हुआ कोषांग जीवित हो जाता है। उसमंे नयी जान आ जाती है। शिथिल मांसपेशियां सबल और पुष्ट हो जाती हैं।

चेहरे पर भी तेज आ जाता है और हमेशा ताजगी झलकने लगती है। व्यायाम से खून पाक स्थली, यकृत, छोटी आंत और हृदय-पिण्ड तक विशेष रूप से पहुंचता है और इन तमाम शरीर-यंत्रों को शक्तिशाली बना देता है। नियमित व्यायाम से पाचन-प्रणाली सबल हो जाती है, मंद यकृत (लीवर) अधिक काम करने लगता है, हृदय पिंड मजबूत हो जाता है और छोटी आंत की भोजन से रस खींचने की शक्ति बढ़ जाती हैं


यह पढ़कर आश्चर्य होता है कि व्यायाम के सम्बन्ध में हमारे प्राचीन ऋषि और शरीर शास्त्री आयुर्वेदचार्य सुश्रुत ने स्थापित कर दिया है कि ‘व्यायाम से परम आरोग्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है और व्यायाम से विरूद्ध भोजन भी सह्य हो जाता है।’


आधुनिक समय में शरीर को चुस्त-दुरूस्त रखने के लिए व्यायाम की अनेक पद्धतियों का उपयोग हो रहा है। यौगिक आसनों के प्रचार के साथ-साथ उन्नत किस्म के यंत्रों वाले जीम का भी प्रसार हुआ है। लेकिन यह सही है कि साधारणतया व्यायाम दो तरह से किया जाता है।

एक ओर यह खाली हाथ से किया जाता है तो दूसरी ओर यंत्रों की सहायता से किया जाता है।

दंड-बैठक आदि हम खाली हाथ से करते हैं। इस तरह का व्यायाम कम स्थान पर और कहीं भी खुली जगह में कर सकते हैं।

डम्बेल भी इसी तरह का व्यायाम है। किन्तु वह सब खेल भी व्यायाम की श्रेणी में आता है जो खुली हवा में खेले जाते हैं। कुश्ती, तैरना, नाव खेना, लाठी फिराना, फुटबाॅल, कबड्डी, क्रिकेट, टेनिस, हाॅकी, रस्सा खींचना, दौड़ना, फांदना, टहलना इत्यादि काफी सुविख्यात और लाभकारी व्यायाम माने जाते हैं। इनसे शारीरिक लाभ के साथ आनंद भी आता है। एक बात सुनिश्चित है कि केवल व्यायाम से ही शरीर सुगठित नहीं होता है बल्कि आनन्द भी शरीर गठन में सहायक होता है।

मन की प्रसन्नता स्वास्थ्य सम्पन्न बनाती है। इसीलिए खेल को भी अच्छा व्यायाम माना गया है। क्योंकि इन खेलों में श्रेष्ठ व्यायाम का लाभ मिलता है। लेकिन अधिकतर खेलों में शरीर का व्यायाम एक सीमा तक ही होता है। ऐसी स्थिति में खेल के साथ अलग से व्यायाम भी जरूरी हो जाता है। अधिकांश खिलाड़ी व्यायाम करते ही हैं।


व्यायाम शुरू करने के साथ ही सावधानी की भी हिदायत दी गई है। व्यायाम पहली बार शुरू करने पर हमेशा धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए। पहले हल्का व्यायाम किया जाना चाहिए। कमजोर व्यक्ति को एक दो दंड और तीन चार बैठक से व्यायाम शुरू करना चाहिए। अभ्यास होते-होते व्यायाम की मात्रा में वृद्धि होनी चाहिए। यही सावधानी यौगिक आसनों के अभ्यास से भी बरतनी चाहिए। आसन-व्यायाम में हाथ पैर सहित अनेक अंगों को इधर-उधर घुमाने और मोड़ने-तोड़ने पड़ते हैं। जल्दीबाजी में अभ्यास करने से कभी-कभी ऐसी क्षति पहुंचती है कि चिकित्सा करानी पड़ती है।

एक कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘बछिया उठाने का अभ्यास करने से जब वह गाय बन जाती है तब भी उसे उठाया जा सकता है।‘ व्यायाम करते-करते, क्रमशः शरीर सबल होता जाता है। समय-बीतने के साथ कठिन अभ्यास किया जा सकता है। लेकिन पहले ही जल्दीबाजी से बचना चाहिए। कठिन व्यायाम का अंत भी हल्की कसरत के साथ करना चाहिए। विशेषज्ञों की सलाह है कि थकावट होने से पहले ही व्यायाम को समाप्त कर देना चाहिए। कभी भी अधिक व्यायाम अच्छा नहीं होता। व्यायाम से शरीर में नये बल का संचार होना जरूरी है जो उचित व्यायाम से ही सम्भव है। व्यायाम के बाद कमजोरी या थकावट महसूस हो तो संभल जाना चाहिए।

किसी को भी अपनी ताकत से आधा ही व्यायाम करना चाहिए। सुश्रुत के चिकित्सा-स्थानम (24-27) में निर्देशित है कि ‘अधिक व्यायाम से कमजोरी तो होगी।’ व्यायाम हमेशा खुली हवा में करनी चाहिए। शरीर के इससे पूरा आक्सीजन मिलेगा और समुचित लाभ मिलेगा। व्यायाम के साथ श्वास प्रश्वास का व्यायाम भी कर लेने से दोहरा लाभ मिलता है।


विशेषज्ञों की एक चेतावनी यह भी है कि व्यायाम करते समय शरीर में जरा भी दर्द मालूम पड़े तो समझना होगा कि व्यायाम को धीरे-धीरे बढ़ाने के बजाय जल्दीबाजी की गई है। ऐसी हालत में व्यायाम को बहुत कम करते हुए धीरे-धीरे अभ्यास शुरू करना चाहिए। वैसे नियमित व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिनों तक शरीर में कुछ वेदना तो होती ही है जिस पर ध्यान नहीं देकर सावधानी से आगे बढ़ते जाना चाहिए। यह मानना भारी भूल है कि व्यायाम बूढ़े लोगों के लिए नहीं है। वस्तुतः व्यायाम किसी भी उम्र के लोग कर सकते हैं। बूढ़े लोग हल्का व्यायाम कर सकते हैं। बूढ़े लोगों के लिए टहलना बहुत निरापद और बहुत लाभदायक व्यायाम है।

प्रौढ़ लोगों को युवकों की तरह ही व्यायाम करना उचित है। हालांकि एक दम रूग्ण लोगों को व्यायाम से दूर रहना उचित है। बुखार और सभी प्रकार के नये रोगों में विश्राम ही सबसे बड़ी चिकित्सा हैः, बुखार में व्यायाम करने से बुखार और अधिक बढ़ जाता है। स्वस्थ होने पर व्यायाम का अभ्यास जारी कर देना चाहिए। बूढ़े लोगों की तरह पुराने रोगियों को भी हल्का व्यायाम करना जरूरी है हालांकि उनके लिए भी टहलना अधिक निरापद है। कहा भी गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। अतः स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम का अभ्यास जरूरी है।